"निरामय आरोग्य संस्थान ने हमें न केवल सिर पर छत दी, बल्कि भविष्य के सपने देखना भी सिखाया।" — सरीला और सुशीला
बस्तर के सघन जंगलों में नक्सली हिंसा में माता-पिता को खोने के बाद सरीला और सुशीला दोनों बहनें बिल्कुल एकाकी और असहाय जीवन जी रही थीं। गाँव में जब गोलियों की तड़तड़ाहट गूंजी, तो जान बचाने के लिए उन्हें घने जंगलों में भागना पड़ा। उनके पास न कोई सहारा था, न सुरक्षित छत और न ही दो वक्त का भोजन।
निरामय आरोग्य संस्थान की टीम जब दूरस्थ अंचल में सर्वेक्षण और राहत कार्य हेतु पहुँची, तो इन दोनों अनाथ बच्चियों की स्थिति देखकर उन्हें तत्काल सुरक्षा और संरक्षण में लिया गया। उन्हें नारायणपुर स्थित बखरूपाड़ा कन्या छात्रावास व विद्यालय में लाया गया।
आज बखरूपाड़ा कन्या विद्यालय में ये दोनों बहनें नियमित पढ़ाई कर रही हैं। उन्हें सुरक्षित आवासीय माहौल, संतुलित पौष्टिक आहार, वस्त्र और आधुनिक डिजिटल शिक्षा मिल रही है।
जब उनसे उनके भविष्य के सपने के बारे में पूछा गया, तो दोनों का एक ही दृढ़ संकल्प था: "हम बड़ी होकर नर्स बनना चाहती हैं ताकि अपने गाँव और जंगल के जरूरतमंद लोगों का इलाज कर सकें।"