"नक्सली गतिविधियों ने बस्तर के सैकड़ों बच्चों से उनका बचपन छीन लिया। स्कूल की घंटी की जगह धमाकों की आवाज सुनने वाले ये बच्चे आज पहली बार कलम पकड़ना सीख रहे हैं।"
"जब गाँव में गोलियां चलीं, तो हमने जंगल में शरण ली। निरामय आरोग्य संस्थान ने हमें न केवल सिर पर छत दी, बल्कि भविष्य के सपने देखना भी सिखाया।"
संघर्ष: नक्सली हिंसा में माता-पिता को खोने के बाद दोनों बच्चियां असहाय थीं।
बदलाव: आज बखरूपाड़ा कन्या विद्यालय में पढ़ाई कर रही हैं और बड़ी होकर नर्स बनना चाहती हैं।
"सोमरी और फूलो ने कभी बिजली का बल्ब तक नहीं देखा था। जब वे पहली बार स्कूल आईं, तो हर नई वस्तु से डरती थीं।"
नवाचार: आज वे स्मार्ट टीवी पर विज्ञान के प्रयोग और नक्शे देखती हैं।
असर: डिजिटल साक्षरता ने डर खत्म कर दिया, अब वे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से शिक्षकों से सवाल पूछती हैं।
"बिना किसी सहारे के, समाज की बेरुखी और भीषण गरीबी के अभावों के बीच जीवन व्यतीत किया।"
संघर्ष: गंभीर सामाजिक दंश और भीषण गरीबी से जूझती रहीं।
बदलाव: आज संस्थान के संरक्षण में सबरी को गरिमा, सम्मान और शिक्षा की नई दिशा मिली है।
"सगनी के पिता की नक्सली जनअदालत में हत्या के बाद पूरा परिवार बिखर गया था।"
घटना: पिता की हत्या के सदमे से बाहर निकालकर संस्थान ने सगनी को सुरक्षित आवास व शिक्षा प्रदान की।
"घर की माली हालत व असुरक्षा के कारण सीमांत गाँव 'कोपिन गुंडा' में बकरियां चराने भेजा गया था।"
आज़ादी: आज रानू उस चंगुल से आज़ाद होकर निरामय आरोग्य संस्थान के साथ जुड़कर अपनी शिक्षा पूरी कर रही है।
"केवल प्रशिक्षण नहीं, बल्कि प्रसंस्करण मशीनरी उपलब्ध कराकर आजीविका से जोड़ना।"
प्रकल्प: इमली कैंडी, महुआ जैम, आमचूर, चिरौंजी व लाख कैंडल निर्माण इकाई से स्थानीय परिवारों की आय में सतत वृद्धि।